दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश में एक ऐसी पुरानी प्रथा चली आ रही है, जो शोक को दर्द भरी याद बना देती है। यहां के दूरस्थ पहाड़ी इलाकों में रहने वाली एक जनजाति की महिलाएं अपनों की मौत पर अपनी उंगलियों का हिस्सा काट लेती हैं। ये रिवाज सदियों से चला आ रहा है और आज भी कुछ जगहों पर निभाया जाता है।

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रिवाज का रहस्यमयी नाम
इस प्रथा को एक खास नाम से जाना जाता है, जो जनजाति की भाषा में शोक का प्रतीक है। रस्सी बांधकर खून रोकने के बाद धारदार पत्थर से उंगली का ऊपरी जोड़ काट लिया जाता है। फिर घाव को गर्म पत्थर या प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से बंद कर दिया जाता है, ताकि दर्द सहन हो सके। कभी मांएं अपनी संतानों के लिए भी ये कदम उठाती हैं।
सिर्फ महिलाओं का दर्द क्यों?
जनजाति में उंगलियां परिवार की मजबूती और प्यार का निशान मानी जाती हैं। मौत के बाद इन्हें काटना गहरे शोक को दिखाने का तरीका है, जो मृत आत्मा को सुकून देता है। पुरुष कभी-कभी कान का टुकड़ा काटते हैं, लेकिन ये बोझ मुख्य रूप से महिलाओं पर ही आता है। इससे बुरी शक्तियों से घर की रक्षा का विश्वास भी जुड़ा है।
बदलते दौर में क्या हो रहा?
अब सरकार ने इस रिवाज पर पाबंदी लगा दी है, लेकिन जंगलों के बीच बसे गांवों में ये चुपके से जारी है। युवा पीढ़ी नाच-गाना और मिट्टी मलकर शोक मना रही है। पर्यटक इस रहस्यमयी जगह पर आकर जनजाति की जिंदगी देखते हैं, लेकिन प्रथा धीरे-धीरे कम हो रही है।
जनजाति की अनोखी दुनिया
ये लोग ऊंचे पहाड़ों की घाटी में शकरकंद उगाते हैं और सुअर पालते हैं। दशकों पहले विदेशी खोजकर्ताओं ने इन्हें दुनिया के सामने लाया। पहले जंगली माने जाते थे, लेकिन अब ये शांत किसान जीवन जीते हैं। उनकी हर परंपरा प्रकृति और आत्माओं से जुड़ी हुई है।
















