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Success Story: न डिग्री, न फंडिंग! घर की रसोई से शुरू हुआ ठेकुआ बिजनेस, आज लाखों की कमाई

गुवाहाटी के 23 वर्षीय तिलक पंडित ने बिहार के पारंपरिक ठेकुआ को अपने ब्रांड ‘देसी टेसी’ के जरिए पूरे देश में लोकप्रिय बना दिया है। उन्होंने साल 2023 में घर की रसोई से इस स्टार्टअप की शुरुआत की थी, जो अब 12 लाख रुपये से अधिक का सालाना टर्नओवर कर रहा है और महिलाओं को रोजगार भी दे रहा है।

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Success Story: न डिग्री, न फंडिंग! घर की रसोई से शुरू हुआ ठेकुआ बिजनेस, आज लाखों की कमाई
Success Story: न डिग्री, न फंडिंग! घर की रसोई से शुरू हुआ ठेकुआ बिजनेस, आज लाखों की कमाई 2

कभी-कभी छोटी-सी पारंपरिक रेसिपी भी बड़े सपनों की नींव बन जाती है। बिहार के पारंपरिक व्यंजन ठेकुआ (Thekua) को हर बिहारी भली-भांति जानता है, लेकिन शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही पकवान एक स्टार्टअप आइडिया बन सकता है। गुवाहाटी में रहने वाले 23 वर्षीय तिलक पंडित ने इस देसी स्वाद को अपने ब्रांड ‘देसी टेसी (Desi Tesi)’ के जरिए नया जीवन दे दिया है।

घर की रसोई से शुरू हुआ सफर

तिलक एक साधारण बिहारी परिवार से आते हैं, जिन्होंने जीवनभर ठेकुआ की खुशबू में त्योहार मनाए हैं। हर साल छठ पूजा के समय बने इस मिठे पकवान का उनके बचपन से गहरा जुड़ाव रहा। कॉलेज में एक दिन उन्होंने एक छोटा-सा प्रयोग किया — अपनी मां चांद ज्योति देवी द्वारा बनाए गए ठेकुआ को कॉलेज फेस्ट में बेचने का निर्णय लिया।

परिणाम उम्मीद से कहीं आगे निकला। ठेकुआ का पूरा स्टॉक कुछ ही घंटों में खत्म हो गया। लोग चखने के बाद बार-बार खरीदने लौट आए। उसी पल तिलक को यह एहसास हुआ कि बिहार के इस स्वाद की मांग तो हर जगह है, बस कोई इसे सही तरीके से लोगों तक पहुंचा नहीं पाया। यही सोच उनके स्टार्टअप की बुनियाद बनी।

ठेकुआ से बना ब्रांड ‘देसी टेसी’

साल 2023 में तिलक और उनकी मां ने मात्र घर की रसोई से ‘देसी टेसी’ (Desi Tesi) की शुरुआत की। न कोई बिजनेस बैकग्राउंड, न निवेशक। लेकिन जो चीज उनके पास थी वह थी परंपरा, आत्मविश्वास और गुणवत्ता पर भरोसा।

‘देसी टेसी’ में बनाए जाने वाले ठेकुआ पूरी तरह हैंडमेड होते हैं। इनमें किसी तरह की मशीन या प्रिजर्वेटिव का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इन्हें देसी घी, गुड़ और गेहूं के आटे से बनाया जाता है। यही देसी स्वाद लोगों को सबसे ज्यादा आकर्षित करता है। तिलक ने इस परंपरागत मिठाई को आधुनिक पैकेजिंग और स्वच्छ हाइजीन के साथ ग्राहकों तक पहुंचाने का तरीका अपनाया।

सोशल मीडिया बना सहायक

तिलक ने अपने ब्रांड को प्रमोट करने के लिए किसी बड़े विज्ञापन एजेंसी की मदद नहीं ली। उन्होंने सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम और फेसबुक मार्केटिंग का सहारा लिया। वीडियो और रील्स के जरिए उन्होंने ठेकुआ बनाने की प्रक्रिया, उसकी कहानी और बिहारी संस्कृति से जुड़े भावनात्मक पहलुओं को दुनिया के सामने रखा।

धीरे-धीरे ‘देसी टेसी’ की पहचान गुवाहाटी से निकलकर पूरे देश में फैलने लगी। असम, दिल्ली, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत से भी ऑर्डर आने लगे। लोग सिर्फ मिठाई नहीं खरीद रहे थे, बल्कि एक परंपरा और संस्कृति का हिस्सा बन रहे थे।

लाखों का बिजनेस और महिलाओं को रोजगार

केवल एक साल के भीतर ‘देसी टेसी’ ने असरदार पहचान बना ली। तिलक का यह छोटा-सा प्रयास अब 12 लाख रुपये से अधिक का टर्नओवर करने वाला सफल व्यवसाय बन गया है। वह अपने उत्पादों को अमेजन और अपनी वेबसाइट दोनों के माध्यम से बेचते हैं, जिससे देशभर में ग्राहकों तक आसानी से डिलीवरी हो जाती है।

तिलक की खास बात यह है कि उन्होंने अपने उद्यम को सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ा है। ‘देसी टेसी’ के तहत स्थानीय महिलाओं को प्रशिक्षण और रोजगार दिया जा रहा है। ये महिलाएं अब अपनी कला से कमाई कर आत्मनिर्भर बन रही हैं। इससे न केवल स्वाद का प्रसार हो रहा है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है।

परंपरा और आधुनिकता का संगम

‘देसी टेसी’ सिर्फ एक फूड ब्रांड नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि यदि विचार सही हो, तो परंपरा और आधुनिकता एक साथ चल सकती हैं। तिलक पंडित ने दिखाया कि छोटे विचारों में भी बड़ा बिजनेस छिपा होता है।

बिहार का ठेकुआ आज ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर जगह बना चुका है, और इसके साथ बिहार की संस्कृति, मेहनत और मिठास देशभर के घरों में पहुंच रही है। तिलक की यह सफलता उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो अपने क्षेत्रीय स्वाद, कला या परंपरा को एक नई पहचान देना चाहते हैं।

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