
अनीश मालपानी ने साबित कर दिया कि कचरा भी सोना बन सकता है। अमेरिका में अच्छी नौकरी छोड़कर भारत लौटे अनीश ने चिप्स के खाली पैकेट यानी Multi-Layered Plastic (MLP) से फैशनेबल धूप के चश्मे बनाकर मात्र सात दिन में 11 लाख रुपये का राजस्व कमाया। उनकी यह कहानी सिर्फ कमाई तक सीमित नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और गरीबों के सशक्तिकरण की मिसाल भी है।
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अमेरिका की नौकरी छोड़कर भारत में किया नया प्रयोग
अनीश मालपानी ने University of Texas, USA से बीबीए की डिग्री हासिल की और अमेरिका में एक अच्छी नौकरी कर रहे थे। लेकिन उनका दिल हमेशा भारत में था। खासकर मुंबई के देवनार डंपिंग ग्राउंड में काम करने वाले गरीब लोगों की हालत देखकर उन्होंने महसूस किया कि उन्हें कुछ बड़ा करना चाहिए।
उनका उद्देश्य केवल कमाई नहीं, बल्कि समाज और पर्यावरण के लिए योगदान देना था। इस सोच ने जन्म दिया WITHOUT नामक कंपनी को, जो दुनिया की पहली ऐसी कंपनी है जो MLP प्लास्टिक से बने चश्मे बेचती है।
चिप्स का पैकेट, धूप का चश्मा
अनीश ने देखा कि भारत में चिप्स के पैकेट में चिप्स कम और हवा ज्यादा भरी होती है, और कंपनियां इसी हवा से ज्यादा मुनाफा कमाती हैं। आम लोग पैकेट खाने के बाद इसे फेंक देते हैं। अनीश ने इसी खाली प्लास्टिक को काम आने वाले मटेरियल में बदलकर धूप के चश्मे बनाने का तरीका खोज निकाला।
उनकी कंपनी WITHOUT के पहले लांच में उन्होंने मात्र एक हफ्ते में 500 जोड़ी चश्मे बेचे, और हर चश्मे की कीमत 500 रुपये थी। कुल मिलाकर, कंपनी ने पहले हफ्ते में ही 11 लाख रुपये का रेवेन्यू हासिल कर लिया।
रिसर्च और इनोवेशन: MLP को बनाया काम आने योग्य
साल 2020 में अनीश ने Ashaya Recyclers Private Limited की स्थापना की। उन्होंने पाया कि MLP पैकेजिंग को रीसाइकल करना आसान नहीं है। इस चुनौती को पार करने के लिए उन्होंने केमिस्ट्री में पीएचडी धारक विशेषज्ञ को अपनी टीम में शामिल किया और दोनों ने मिलकर रिसर्च शुरू की।
इस रिसर्च के जरिये उन्होंने MLP से उच्च गुणवत्ता वाला मटेरियल तैयार किया, जिससे फैशनेबल और टिकाऊ धूप के चश्मे बन सके।
कचरा बीनने वालों की जिंदगी में सुधार
अनीश सिर्फ धूप के चश्मे बेचकर मुनाफा नहीं कमा रहे हैं, बल्कि गरीब और इनफॉर्मल इकॉनमी के लोगों को भी सशक्त बना रहे हैं। भारत में लगभग 10 से 40 लाख कचरा बीनने वाले हैं, जो बेहद गरीब जीवन जीते हैं।
उनकी कंपनी बिक्री का 10% हिस्सा कचरा बीनने वालों के बच्चों की पढ़ाई और देखभाल में देती है। इसके अलावा, अनीश पुणे में West Picker Collective नामक ग्रुप के साथ भी काम कर रहे हैं, जिसमें कई महिलाएं चिप्स के खाली पैकेट देती हैं।
चश्मा बनाने की प्रक्रिया
- एक जोड़ी चश्मा बनाने में: लगभग 5 चिप्स के पैकेट लगते हैं।
- समय: 3-4 दिन में एक जोड़ी तैयार होती है।
- कचरा मूल्य: प्रत्येक किलो पैकेट के लिए महिलाओं को 6 रुपये दिए जाते हैं।
इस प्रक्रिया से न केवल प्लास्टिक कचरे में कमी आई है, बल्कि गरीब महिलाओं और बच्चों को आर्थिक अवसर भी मिला है।
पर्यावरण और समाज दोनों का लाभ
अनीश की पहल से दोहरी जीत हुई है:
- Environment Protection: लैंडफिल में जाने वाला प्लास्टिक कम हुआ।
- Social Impact: गरीब लोगों और उनके बच्चों को शिक्षा और रोजगार मिला।
यह कहानी साबित करती है कि इनोवेशन + सोशल इम्पैक्ट + बिजनेस मिलकर बड़े बदलाव ला सकते हैं
आगे की योजना
अनीश भविष्य में WITHOUT के व्यवसाय को और बड़ा करने और अधिक लोगों को रोजगार देने की योजना बना रहे हैं। उनकी सोच है कि रिसाइकल प्लास्टिक और इनोवेशन के जरिए सस्टेनेबल फैशन को भारत और विश्व में बढ़ावा दिया जाए।
















