
सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति विवादों और पारिवारिक बंटवारे को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि परिवार के सदस्यों के बीच होने वाले ‘फैमिली सेटलमेंट’ (पारिवारिक समझौता) के लिए अब अनिवार्य रुप से रजिस्ट्री या पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होगी, इस फैसले से उन लाखों परिवारों को बड़ी राहत मिली है जो कागजी जटिलताओं के कारण अदालती चक्कर काट रहे थे।
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तकनीकी कमियों के आधार पर समझौता खारिज नहीं होगा
जस्टिस ए.एस. ओका की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि पारिवारिक समझौतों का प्राथमिक उद्देश्य परिवार में शांति बनाए रखना और लंबे समय से चले आ रहे विवादों को आपसी सहमति से सुलझाना होता है। कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि सिर्फ इसलिए किसी समझौते को अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि वह पंजीकृत (Registered) नहीं है।
फैसले की मुख्य विशेषताएं
- मौखिक समझौता भी मान्य: यदि परिवार के सदस्यों ने आपसी सहमति से मौखिक रूप से संपत्ति का बंटवारा किया है और बाद में उसकी याददाश्त के लिए एक ज्ञापन (Memorandum of Family Settlement) तैयार किया है, तो उसे कानूनी साक्ष्य माना जाएगा।
- रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता खत्म: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि समझौता परिवार के भीतर पहले से मौजूद अधिकारों को स्पष्ट करने के लिए है, तो उस पर भारी-भरकम स्टाम्प ड्यूटी या पंजीकरण की जरुरत नहीं है।
- विवादों पर लगाम: इस आदेश का उद्देश्य उन कानूनी दांव-पेचों को कम करना है, जिनका सहारा लेकर लोग आपसी समझौते के बाद भी मुकर जाते थे।
कब लागू होगा यह नियम?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह नियम केवल ‘पारिवारिक व्यवस्था’ पर लागू होता है, इसमें शर्त यह है कि समझौता परिवार के सदस्यों के बीच ही होना चाहिए और इसका उद्देश्य नए अधिकारों का सृजन करना नहीं, बल्कि पहले से मौजूद हिस्सेदारी को व्यवस्थित करना होना चाहिए।
कैसे देखें अपने अधिकार?
संपत्ति से जुड़ी आधिकारिक जानकारी और कानूनी दस्तावेजों के लिए नागरिक अपने राज्य के भूमि रिकॉर्ड पोर्टल (जैसे UP Bhulekh या MP Bhulekh) पर जा सकते हैं, इस फैसले की विस्तृत प्रति पढ़ने के लिए Supreme Court of India की आधिकारिक वेबसाइट पर विज़िट किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न केवल न्यायपालिका पर मुकदमों का बोझ कम करेगा, बल्कि पारिवारिक रिश्तों में कड़वाहट को भी कम करने में मददगार साबित होगा, अब आपसी विश्वास और लिखित सहमति को कानूनी मजबूती मिल गई है।
















