
बॉम्बे हाईकोर्ट ने दिसंबर 2025 में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है जिसने भूमि अधिग्रहण से प्रभावित किसानों और भूमि स्वामियों के अधिकारों को नई मजबूती दी है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि भूमि अधिग्रहण के मामलों में किसानों को मुआवजा बढ़ाने के अपने कानूनी अधिकार के बारे में जानकारी देना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। यह फैसला न केवल एक कानूनी मिसाल के रूप में देखा जा रहा है, बल्कि किसान हितों की सुरक्षा की दिशा में भी बड़ा कदम माना जा रहा है।
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अदालत का रुख: राज्य बने ‘आदर्श संस्था’
जस्टिस एम.एस. कार्णिक और जस्टिस अजीत बी. कादेथाणकर की खंडपीठ ने अपने निर्णय में राज्य की संवैधानिक भूमिका पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि भूमि अधिग्रहण जैसी प्रक्रिया में सरकार को एक “आदर्श साधन” (Model Instrument) के रूप में काम करना चाहिए। इसका अर्थ है कि सरकारी एजेंसियों को केवल अधिग्रहण करने वाली इकाई के रूप में नहीं, बल्कि प्रभावित लोगों के हितों की रक्षा करने वाली जिम्मेदार संस्था के रूप में कार्य करना चाहिए।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि जब किसी व्यक्ति की जीविका भूमि पर निर्भर हो और वही भूमि अधिग्रहित की जाए, तो उसे मिलने वाला मुआवजा उसके भविष्य की जिंदगी का आधार बनता है। इसलिए, किसानों को उचित जानकारी और सहायता देना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
किसानों पर दोष मढ़ना अनुचित
बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा कि अधिकांश मामलों में किसान कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलताओं से अपरिचित होते हैं। कई बार अपनी भूमि खोने के सदमे में वे यह नहीं समझ पाते कि मुआवजा बढ़ाने के लिए अपील करना उनका कानूनी अधिकार है। ऐसे में, यदि कोई किसान निर्धारित अवधि में आवेदन नहीं कर पाता या तकनीकी कारणों से गलती करता है, तो उसे दोषी ठहराना उचित नहीं है।
अदालत ने कहा कि किसानों से यह उम्मीद करना कि वे हर कानूनी पेचीदगी से वाकिफ होंगे, अव्यावहारिक और अन्यायपूर्ण दृष्टिकोण है। राज्य को उनकी स्थिति समझते हुए संवेदनशीलता के साथ व्यवहार करना चाहिए।
तकनीकी आधारों पर आवेदन खारिज करने से परहेज
फैसले का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि अदालत ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 28-ए के तहत किए गए मुआवजा पुनर्निर्धारण के आवेदनों को तकनीकी आधारों पर खारिज करने की प्रवृत्ति की आलोचना की।
अक्सर देखा जाता है कि अधिकारी मामूली कमियों जैसे प्रमाणित प्रतियों की अनुपलब्धता या दस्तावेज़ों की देरी—के आधार पर किसानों के आवेदन अस्वीकार कर देते हैं। अदालत ने कहा कि यदि किसान की मंशा स्पष्ट है और दस्तावेज़ प्रक्रिया में हैं, तो ऐसे आवेदन स्वीकार किए जाने चाहिए। न्याय का उद्देश्य तकनीकीताओं में उलझाना नहीं बल्कि वास्तविक हकदार को राहत देना है।
उदार दृष्टिकोण की आवश्यकता
हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे मुआवजा वृद्धि से संबंधित मामलों में उदार और मानवीय दृष्टिकोण अपनाएं। अदालत ने यह भी माना कि भारत में किसानों का एक बड़ा वर्ग कानूनी प्रक्रियाओं के प्रति अनजान होता है और उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी तक नहीं मिल पाती।
सरकारी अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें आवश्यक जानकारी और परामर्श समय पर उपलब्ध कराए जाएं ताकि वे अपने अधिकारों का सही उपयोग कर सकें। अदालत का यह दृष्टिकोण ग्रामीण भारत में न्याय की पहुंच बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक पहल माना जा रहा है।
मामला कौन-सा था?
यह फैसला तुकाराम जनबा पाटिल बनाम कलेक्टर केस में आया, जहां महाराष्ट्र के किटवाड़ में लघु सिंचाई टैंक परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहित की गई थी। प्रभावित किसानों ने दावा किया था कि उन्हें दिए गए मुआवजे की राशि बाजार दर से बहुत कम थी। जब कुछ किसानों ने मुआवजा वृद्धि के लिए अपील की, तो उनके आवेदन तकनीकी कारणों से खारिज कर दिए गए थे। इसी संदर्भ में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी तकनीकी कमजोरियों के कारण न्याय से वंचित करना संविधान की भावना के विपरीत है।
















