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26 जनवरी लॉन्ग वीकेंड: बर्फबारी का लुत्फ उठाने के लिए बेस्ट हैं ये 5 जगहें! जानें कहाँ मिलेगी सबसे ज्यादा बर्फ और कहाँ होगी भीड़

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26 जनवरी लॉन्ग वीकेंड: बर्फबारी का लुत्फ उठाने के लिए बेस्ट हैं ये 5 जगहें! जानें कहाँ मिलेगी सबसे ज्यादा बर्फ और कहाँ होगी भीड़
26 जनवरी लॉन्ग वीकेंड: बर्फबारी का लुत्फ उठाने के लिए बेस्ट हैं ये 5 जगहें! जानें कहाँ मिलेगी सबसे ज्यादा बर्फ और कहाँ होगी भीड़

मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट (Aurangabad Bench) ने एक अहम फैमिली लॉ (Family Law) निर्णय में कहा है कि यदि पत्नी उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुकी है और सरकारी नौकरी में लाखों रुपये का वेतन प्राप्त कर रही है, तो वह अपने पति से भरण-पोषण (Maintenance) की मांग करने की हकदार नहीं होती। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में पत्नी अपनी जिंदगी “Decently और With dignity” जीने में सक्षम है।

न्यायमूर्ति अभय एस. वाघवासे की पीठ ने कहा कि नौकरी करना भरण-पोषण के अधिकार में बाधक नहीं है, लेकिन अदालत को यह देखना होता है कि पत्नी की अपनी आय उसे उसी जीवन स्तर (Standard of Living) पर बनाए रखने के लिए पर्याप्त है जो विवाह के दौरान उसे मिला करता था।

इस केस में पत्नी एक मेडिकल ऑफिसर (Medical Officer) है और उसका मासिक वेतन ₹1,38,192 है, जिसे हाईकोर्ट ने पर्याप्त माना।

केस की पृष्ठभूमि

यह मामला डॉक्टर दंपति के बीच वैवाहिक विवाद (Marital Dispute) से जुड़ा है। दंपति का विवाह मई 2010 में हुआ और उनका एक बेटा है। हालांकि अगस्त 2010 से वे अलग रहने लगे।

पत्नी ने ‘Domestic Violence Act, 2005’ (D.V. Act) की धारा 12 के तहत JMFC, उदगीर के समक्ष याचिका दायर की और अपने व बेटे के लिए 25,000 रुपये मासिक भरण-पोषण की मांग की।

निचली अदालत ने 3 अगस्त, 2019 को आदेश दिया कि पति:

  • पत्नी को ₹12,000 प्रति माह
  • बेटे को ₹10,000 प्रति माह भरण-पोषण दे
  • ₹7,000 किराया और ₹1,00,000 मुआवजा भी अदा करे

पति ने आदेश को सत्र न्यायालय में चुनौती दी, लेकिन 31 जनवरी, 2023 को उसकी अपील खारिज कर दी गई। इसके बाद हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन एप्लीकेशन नंबर 31 ऑफ 2024 दायर की गई।

पक्षकारों की दलीलें

पति के वकील, ए. ए. यादकीकर ने कहा कि पत्नी MBBS और MD की डिग्री धारण करती है और MPSC के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में मेडिकल ऑफिसर के रूप में नियुक्त है।

पति ने पत्नी की सैलरी स्लिप पेश की, जिसमें मासिक वेतन ₹1,38,192 दिखाया गया। उन्होंने कहा कि पत्नी के पास स्थाई आय है और वह अपने जीवन यापन के लिए पति की मदद पर निर्भर नहीं। हालांकि, पति ने यह स्पष्ट किया कि वह बेटे के खर्च उठाने के लिए तैयार है।

पत्नी का पक्ष

पत्नी के वकील, वी. डी. गुनाले ने निचली अदालतों के फैसले का बचाव किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के रजनेश बनाम नेहा (AIR 2021 SC 569) के फैसले का हवाला दिया और कहा कि भले ही पत्नी कमाती हो, वह उसी जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए Maintenance की हकदार है जो विवाह के दौरान प्राप्त था।

पत्नी ने हलफनामे में कहा कि उसे घर का किराया, आवागमन, बेटे की स्कूल फीस और ट्यूशन के लिए खर्च करना पड़ता है। साथ ही उसने कार और होम लोन की EMIs भी दिखाईं।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने केस के सभी पहलुओं और रजनेश बनाम नेहा सिद्धांत का विश्लेषण किया। अदालत ने यह तय किया कि कमाने वाली पत्नी की आय पर्याप्त है या नहीं, यह देखना जरूरी है कि वह अपने भरण-पोषण को उसी स्तर पर Maintain कर सके जैसा पति के साथ जीवन में था।

आर्थिक स्थिति का अवलोकन:

  • आय: पत्नी का मासिक वेतन ₹1,38,192
  • आवास: पत्नी को HRA मिलता है और वह होम लोन की EMI भर रही है
  • संपत्ति: कार और अपना घर है

न्यायमूर्ति वाघवासे ने टिप्पणी की:

“अलग रहने के बाद, पत्नी के पास अपना घर और वाहन है। आरामदायक जीवन के लिए सभी साधन मौजूद हैं। अपनी आय से वह शालीनता और गरिमा के साथ अपना भरण-पोषण कर सकती है।”

बेटे के खर्च के लिए अदालत ने पाया कि पत्नी ने दस्तावेज पेश नहीं किए, लेकिन पति की ओर से बेटे का खर्च उठाने की सहमति को देखते हुए आदेश बरकरार रखा।

कोर्ट का आदेश

बॉम्बे हाईकोर्ट ने पति की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया और निचली अदालत के आदेश में संशोधन किया:

  • पत्नी के लिए ₹12,000 मासिक Maintenance का आदेश रद्द
  • किराए का आदेश रद्द
  • पति को आदेश जारी कि वह बेटे के भरण-पोषण के लिए ₹10,000 प्रति माह अदा करे

केस विवरण:

  • केस टाइटल: दीपक गंगाधर दाडगे बनाम सौ. विजया पत्नी दीपक दाडगे और अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल रिवीजन एप्लीकेशन नंबर 31 ऑफ 2024
  • कोरम: न्यायमूर्ति अभय एस. वाघवासे

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