रांची में रहने वाली एक पढ़ी-लिखी लड़की ने कॉर्पोरेट दुनिया की चकाचौंध को तिलांजलि दे दी। इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की डिग्री के बाद नौकरी तो मिली, लेकिन मन नहीं लगा। फिर एक दिन बचपन की पुरानी बात याद आई और उन्होंने घर की छत पर ही अनोखा धंधा शुरू कर दिया।

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बचपन का ताना बना जीवन का टर्निंग पॉइंट
बचपन में पड़ोसियों ने चिढ़ाया था- “तुम गिट्टी से खेलो, हम मोतियों से खेलते हैं।” वो बात सालों तक दिमाग में घूमती रही। एक चैनल पर मोती उगाने की खबर देखी तो सोचा, क्यों न इसे आजमाया जाए। ट्रेनिंग ली तो पता चला कि इसके लिए न खेत चाहिए, न तालाब- बस थोड़ी सी जगह। घर के 10×20 के कोने में बड़े-बड़े टब रखे और काम शुरू।
कम लागत, जबरदस्त मुनाफा हर मोती पर
प्रक्रिया आसान लेकिन सटीक। पानी साफ रखो, सीप चुनो, सही आहार दो और बीमारियों से बचाओ। हर मोती पर महज 45 रुपये खर्च, लेकिन बिक्री पर 150 रुपये तक की कमाई। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर ग्राहक खुद आ जाते हैं। 18-20 महीने में फसल तैयार, और महीने भर में 60-70 हजार की इनकम हो जाती है।
देशभर में मोतियों की मार्केट बूमिंग
हाई क्वालिटी मोतियों की डिमांड स्काई हाई है। ज्वेलरी से लेकर कॉस्मेटिक्स तक हर जगह यूज। भारत अभी इंपोर्ट पर निर्भर है, इसलिए लोकल प्रोडक्शन का स्कोप कमाल का। तैयार माल रखो तो खरीदार लाइन लगाते हैं, बेचने की टेंशन जीरो।
खुद की मालकिन बनीं, दूसरों को भी सिखा रहीं
अब कोई बॉस नहीं, खुद राज। चार-पांच महिलाओं की टीम बना ली। पड़ोस की बहनें-भाभियां छत पर आकर देखती हैं, सीखती हैं और खुद शुरू कर देती हैं। अगर 10 औरतें प्रेरित हो जाएं तो इससे बड़ी जीत क्या? ये कहानी बताती है कि छोटे से स्पेस से भी बड़ा साम्राज्य खड़ा हो सकता है।
















