संपत्ति नीलामी के बाद अब कोई अलग कोर्ट केस नहीं चला सकता। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत बिक्री पुष्टि होने पर ऐसा करना गैरकानूनी है। यह फैसला लाखों संपत्ति विवादों को नई दिशा देगा।

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लोन का पुराना जाल
कहानी 1970 के दशक की है। एक किसान ने ट्रैक्टर खरीदने के लिए बैंक को जमीन गिरवी रख दी। किस्तें न चुकाने पर बैंक ने 1984 में कोर्ट से डिक्री ले ली। निष्पादन प्रक्रिया चली और 1988 में पूरी संपत्ति नीलाम हो गई। किसान के बेटों ने 35 हजार रुपये की बोली लगाकर संपत्ति हासिल कर ली। बिक्री अगस्त में पक्की हुई और कब्जा जून 1989 तक सौंप दिया गया।
नई चाल का फेरबदल
नीलामी के महज एक महीने बाद दूसरे पक्ष ने कोर्ट में नया मुकदमा दायर कर दिया। दावा किया कि नीलामी में धांधली हुई और उनकी हिस्सेदारी पर बिक्री अमान्य है। ट्रायल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक फैसले उनके हक में आए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सारी निचली अदालतों के फैसलों को पलट दिया। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की बेंच ने इसे सख्ती से खारिज कर दिया।
CPC का सख्त नियम 92(3)
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिक्री पुष्टि के बाद नियम 89 या 90 से कोई आवेदन न करने वाले को अलग वाद का अधिकार नहीं। निष्पादन से जुड़े सभी विवाद उसी कोर्ट में सुलझने चाहिए। अलग मुकदमा चलाना सीधे तौर पर वर्जित है। यह नियम संपत्ति खरीदारों को लंबे मुकदमों से बचाएगा।
धारा 47 ही एकमात्र रास्ता
अब सिर्फ धारा 47 के तहत आवेदन दायर करने का विकल्प बचा है। यह सिर्फ अधिकार क्षेत्र की कमी या आदेश की शून्यता जैसे मामलों में लागू होगा। कोर्ट ने चेताया कि पुराने दावों को समय सीमा के बाद जिंदा करने की कोशिश नाकाम होगी। अगर आवेदन नियम 89-91 जैसे आधारों पर हो तो सीमा कानून लागू हो जाएगा।
संपत्ति बाजार में नया ब्रेक
यह फैसला बैंक लोन और गिरवी संपत्तियों की नीलामियों को मजबूत करेगा। लिस पेंडेंस सिद्धांत से बंधे पक्षकार अब अलग मुकदमे की बजाय सही चैनल चुनेंगे। दुर्लभ मामलों में ही शून्यता का दावा चलेगा। कुल मिलाकर, नीलामी प्रक्रिया अब ज्यादा पारदर्शी और तेज होगी। वकीलों को भी नई रणनीति अपनानी पड़ेगी।
















